स्वदेशी ताकत बरसाएगी मौत...

आतंकिस्तान को तबाह करने में सक्षम है ब्रह्मोस 


नई दिल्ली: भारत की घातक अस्त्र मिसाइल अब तैयार हो चुकी है. इसे सुखोई 30 MKI (Sukhoi 30 MKI)) फाइटर जेट से फायर किया जा सकता है. लिहाजा, ब्रह्मोस को हवा से हवा में मार करने की मिसाइल के तौर पर विकसित किया जा रहा है. सबमरीन के जरिये ब्रह्मोस को फायर करने का पहला परीक्षण 2013 में विशाखापट्टनम के पास किया गया था. मिसाइल ने समुद्र की सतह के नीचे से फायर होने के बाद अपने लक्ष्य तक 290 किमी का सफर कामयाबी से पूरा किया. अब मिसाइल के सबमरीन लॉन्च अवतार को विकसित करने का काम अंतिम चरण में है और जल्द ही ये सबमरीन में लगने के लिए तैयार हो जाएगी. संभावना है कि इसे प्रोजेक्ट 75(I) में बनने वाली सबमरीन में लगाया जाएगा. प्रोजेक्ट 75(I) में कुल 6 सबमरीन बननी हैं जिन्हें किसी भारतीय शिपयार्ड में बनाया जाएगा.

ये सबमरीन अभी बन रही कलवरी क्लास का आधुनिक संस्करण होंगी. इनमें AIP लगाया जाएगा जिससे इन्हें अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए हफ्ते में केवल एक बार ही सतह पर आना होगा यानि दुश्मन को सबमरीन की समुद्र में आहट मिलना लगभग नामुमकिन. खामोशी से समुद्र में छिपी ऐसी सबमरीन से 500 किमी तक ज़मीन पर आवाज से तीन गुना ज्यादा रफ्तार से ब्रह्मोस का हमला होने पर तबाह होने से पहले दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलेगा. 

अभी भारत के पास ब्रह्मोस अचूक है. ये निशाने के एक मीटर के दायरे में ही गिरती है. अभी भारतीय नौसेना के सबमरीन बेड़े में केवल स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत ही ज़मीन पर लंबी दूरी तक हमला करने वाली बैलेस्टिक मिसाइल से लैस है. लेकिन ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल होने के कारण ज्यादा बेहतर निशाना लगा सकती है. चीन के पास सबमरीन से लॉन्च होने वाली मिसाइलों की कई किस्में हैं जिनमें न्यूक्लियर हमला करने वाली मिसाइलें भी शामिल हैं. ऐसे में सबमरीन से लांच होने वाली ब्रह्मोस से समुद्र में चीनी सबमरीन के दबदबे को चुनौती देने का मौका मिलेगा.

ब्रह्मोस को भारतीय सेना ने 2007 में तैनात करना शुरू किया था. इसे मोबाइल लांचर के जरिये लॉन्च किया जा सकता है. भारतीय सेना में ब्रह्मोस की चार रेजीमेंट हैं जिनमें 90 डिग्री के एंगल से हमला करने वाली ब्लॉक 2 और ब्लॉक 3 मिसाइलें भी शामिल हैं. नौसेना ने आईएनएस राजपूत को 2003 में सबसे पहले ब्रह्मोस से लैस किया. इस समय नौसेना के कोलकाता और विशाखापट्टनम क्लास डिस्ट्रॉयर्स के अलावा शिवालिक, तलवार और नीलगिरि क्लास फ्रिगेट्स को भी लैस किया जा चुका है. इन जहाजों से 2-2 सेकंड के अंतर से 8 मिसाइलों की बौछार की जा सकती है जो किसी बड़े बेड़े को बेहतरीन मिसाइल डिफेंस सिस्टम के बावजूद तबाह कर सकती हैं.

सुखोई 30 फाइटर जेट में ब्रह्मोस को लगाने का काम चल रहा है. भारतीय वायुसेना के कुल 40 सुखोई 30 जेट्स को ब्रह्मोस से लैस किया जा रहा है और जनवरी में तमिलनाडु के तंजावुर में ब्रह्मोस से लैस सुखोई की पहली स्क्वाड्रन तैनात भी हो गई है. इस स्क्वाड्रन की जिम्मेदारी हिंद महासागर और अरब सागर में चीनी नौसेना की गतिविधियों को काबू में रखना है. हवा से मार करने वाली ब्रह्मोस को अब हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल के तौर भी विकसित किए जाने की कोशिश शुरू हो गई है.

भारतीय वायुसेना स्वदेशी अस्त्र मिसाइल इस्तेमाल करती है जिसकी रेंज 150 किमी और वजन 158 किलोग्राम होता है. इसके अलावा रूसी KS-172 एयर टू एयर मिसाइल भी भारतीय वायुसेना इस्तेमाल करती है. जिसका वज़र 750 किग्रा और रेंज 300 किमी तक होती है. इसे दुनिया की सबसे भारी एयर टू एयर मिसाइल भी माना जाता है. सुखोई में लगाई गई ब्रह्मोस का वजन घटाकर 2500 किग्रा किया गया था. यानि इस बात की संभावना है कि ब्रह्मोस एयर टू एयर मिसाइल अपने क्लास की दुनिया की सबसे भारी मिसाइल साबित हो.