सदी की सबसे बड़ी चुनौती से जूझता राष्ट्र

सौ साल पुरानी बात है। भारत इंफ्लूएंजा महामारी की चपेट में था, जो 1918 से 1920 तक चली। बीमारी खास तौर पर 20 से 40 साल की उम्र के लोगों को मार रही थी। उस दौर के गवाह रहे प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने लिखा था- ‘गंगा नदी लाशों से भर गई थी।’ महामारी ने 1.7 करोड़ (तब की भारतीय आबादी का लगभग 5 प्रतिशत) से ज्यादा लोगों की जान ली, विश्व में सबसे ज्यादा। इसके चलते 1911 और 1921 के बीच के दशक में भारत की जनसंख्या वृद्धि दर घट गई थी। करीब एक सदी बाद मार्च 2020 में भारत को कोविड-19 के प्रकोप को लेकर गंभीर आशंकाओं का सामना करना पड़ रहा है। यहां तक कहा गया कि हालात ज्यादा खराब हुए तो भारत में तकरीबन 60% (70-80 करोड़) लोग संक्रमित हो सकते हैं। मार्च में जब आईसीएमआर के अधिकारी अनिर्णय की स्थिति में थे, केंद्र ने जरूरी कदम उठाते हुए पूरे देश के लिए ‘कठोर’ लॉकडाउन लागू कर दिया। हिर है, भारत ने अपनी हेल्थकेयर क्षमता (बेड, पीपीई, टेस्टिंग किट) तैयार करने के लिए समय हासिल करने के वास्ते ऐसा किया था। महामारी से लंबी लड़ाई के लिए सरकार की क्षमता को बढ़ाने में लॉकडाउन काफी हद तक सफल भी रहा। मौजूदा टेस्टिंग क्षमता के बूते हम 20 लाख से ज्यादा कन्फर्म मामलों का पता लगा चुके हैं। लॉकडाउन को लागू करने में केंद्र और विभिन्न राज्यों की प्रतिक्रिया पर भी हमें गौर करना होगा। 

सरकार ने लॉकडाउन की करीब 60 दिन की अवधि में 4,000 से अधिक दिशा-निर्देश जारी किए। प्रधानमंत्री की निगरानी में जारी इन दिशा-निर्देशों मंा अधिकांश का मकसद नागरिकों के घर के अंदर रहते हुए उन्हें जरूरी सामान की आपूर्ति सुनिश्चित करना था। आजाद भारत के इतिहास में इससे पहले एक महामारी के बीच देश को बचाने और अर्थव्यवस्था को संभालने की ऐसी चुनौती कभी किसी सरकार के सामने नहीं आई थी। महामारी की विकरालता को समझने के बाद शुरुआती तौर पर केंद्र ने नई स्थितियों से निपटने के लिए पीपीई के अधिक उत्पादन पर जोर दिया। इस बीच प्रधानमंत्री के संबोधन ने इसे जन आंदोलन में बदल दिया। सहमत और तैयार जनता के सहयोग के बिना कोई भी देश करीब 2 महीने घरों के अंदर नहीं रह सकता था। अमेरिका और ब्रिटेन को जहां अड़ियल नागरिकों के विरोध का सामना करना पड़ा, वहीं भारत के शहरी और ग्रामीण इलाकों की जनता ने इस उद्देश्य के लिए प्रतिबद्धता दिखाई। पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट (पीपीई) की बात करते हैं। इस साल जनवरी में जब भारत में कोविड-19 का प्रकोप शुरू हुआ, यहां पीपीई (एन95 मास्क सहित) के उत्पादन की बहुत सीमित क्षमता थी। अधिकांश उत्पादों का आयात ही किया जाता था। 

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ऐसे चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 30 जनवरी को अधिकारियों का एक अधिकार संपन्न समूह गठित किया। तब से भारत में पीपीई के घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। केंद्र सरकार के करीब 2.2 करोड़ पीपीई के ऑर्डर को पूरा करने के लिए घरेलू उत्पादक मई तक ही 1.42 करोड़ पीपीई की आपूर्ति करने में सक्षम हो गए थे। इस उद्योग ने 7000 करोड़ रुपये के अनुमानित कारोबार के साथ काफी तरक्की की है। एक न्यूज पोर्टल में जुलाई में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक मार्च में भारत प्रतिदिन करीब 3,000 पीपीई का उत्पादन कर रहा था, लेकिन जून तक रोजाना 8,00,700 पीपीई का उत्पादन करने लगा था। अभी भारत कई प्रकार के पीपीई निर्यात भी कर रहा है। हालांकि खतरा अभी टला नहीं है। राज्यों में स्थानीय स्तर पर इसका प्रकोप बना रहेगा। चूंकि संविधान में स्वास्थ्य राज्य सरकार का विषय है, इसलिए विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा लॉकडाउन के बाद रोकथाम के उपायों का असर अलग-अलग दिखाई दिया। दिल्ली के मामले पर गौर करें। जून के अंत में यहां के उप मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली में 31 जुलाई तक संक्रमितों का आंकड़ा 5.50 लाख तक पहुंच सकता है। शुक्र है, केंद्र ने राज्य सरकार की मदद के लिए समय से कदम उठाया। राज्य के कंटेनमेंट एरिया की रणनीति में बदलाव किया गया और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग रणनीति को प्रभावी बनाया गया। इस बीच सबसे बड़े कोविड-19 केयर सेंटर की शुरुआत के साथ राज्य की बेड क्षमता का विस्तार करने में मदद की गई। इसका श्रेय उसे दिया जाना चाहिए जो इसका हकदार है- समय पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप ने राजधानी को बचा लिया। 

भारत की मौजूदा रणनीति हालांकि अपने स्वरूप में अवसरवादी लग सकती है, जो कि तात्कालिक उपायों पर आधारित है, लेकिन असल में इस ढर्रे को ही दुनिया बड़े पैमाने पर तेजी से अपना रही है। ब्रिटेन ने अपने भीड़भाड़ वाले इलाकों को खोलने और प्रतिबंध ढीले करने की घोषणा की है। साथ ही एक रणनीति का पालन किया गया, जिसके तहत स्थानीय स्तर पर प्रकोप को काबू में रखना शामिल है- यूके के स्वास्थ्य मंत्री मैट हैनकॉक ने कहा, ‘हर हफ्ते, देश भर में 100 से ज्यादा स्थानीय नियम बनाए जा रहे हैं। इनमें से कुछ खबर में आएंगे, लेकिन अधिकांश आसानी से और चुपचाप लागू कर दिए जाएंगे। कोविड-19 का प्रकोप किसी एकमुश्त उपाय (मसलन, कोई आम दवा या वैक्सीन) से खत्म नहीं होगा। अब हम ‘न्यू नॉर्मल’ के दौर में हैं, जहां कोई देश इस बीमारी में काम आने वाली दवाओं (जैसे रेमडेसिविर और अमेरिका का मामला) की पूरी आपूर्ति गड़प कर जाता है। यह एक लंबी लड़ाई होगी जहां किसी देश की सरकार और जनता की आंतरिक सहनशीलता मायने रखेगी। मोदी सरकार ने अभूतपूर्व संकट से निपटने में कुशल नेतृत्व का परिचय दिया है, जिसके चलते भारत बड़ी आबादी, ज्यादा घनत्व और गरीबी की चुनौतियों के बावजूद ज्यादातर देशों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। इस नेतृत्व के साथ भारत इस वायरस से उबर जाएगा और फिर से उठ खड़ा होगा।

                                                                                                             वरुण गांधी

( नोट : उपरोक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं )