बीजेपी के लोगों में पद नहीं मिलने से कई बार ये नाराजगी उजागर होती देखी जा चुकी है...
नेताओं व प्रदेश सरकार के बीच फैलता रायता और प्रदेश में कमजोर होती भाजपा !
मध्य प्रदेश में भाजपा की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। पार्टी के नेताओं की आपसी खींचतान एवं अंदरूनी गुटबाजी के चलते 20 वर्षों से एक छत्र शासन करने वाली पार्टी की कमजोरी उजागर हो रही है। मुख्यमंत्री जी के संपूर्ण मध्य प्रदेश के दौरे के बजाय केवल उज्जैन संभाग में ही सीमित रहने से यह स्पष्ट होता है कि पार्टी के अंदरूनी विवाद ने उन्हें भी घेर लिया है।
मंत्रीगण भी अपने से श्रेष्ठ निरूपित करने के लिए एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। पुराने खाटी नेताओं की अपने अपने क्षेत्र में धाक जमी होने के कारण मंत्रीगण की अपने क्षेत्र के अलावा दूसरे इलाके में सर्वमान्य स्वीकार्यता नहीं के बाराबर दिखाई देगी है। क्योंकि स्थानीय अधिकारी कर्मचारी अपने नेता की बात को अधिक तवज्जो देते हैं। फलत: स्थानीय नेताजी की मनमानी के आगे 'बहुजन हिताय बहुजन सुखाए' के कार्य परवान नहीं चढ़ पा रहे हैं। यह स्थिति पार्टी के लिए बहुत ही चिंताजनक है। आम जनता की समस्याओं को सुनने और उनका समाधान करने के बजाय, नेता अपने व्यक्तिगत हितों को साधने में लगे हुए हैं।
इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों ने सिद्ध कर दिया है कि जनता के प्रतिनिधि वास्तव में जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं, बल्कि सत्ता का मद और कोरा ढकोसला है। दिल्ली दरबार में अपनी धाक जमाने के लिए साम -दाम -दंड -भैद की नीति अपना रहे हैं। जन्मदिन एवं सालगिरह के अवसर पर लाखों रुपए के पोस्टर सड़कों पर लग जाते हैं। पोस्टर आधारित राजनीति पार्टी के लिए बहुत ही घातक सिद्ध हो सकती है।
शासन- प्रशासन की कार्यप्रणाली को नजदीकी से परखने से आभास होता है कि कुछ सलाहकार ऐसे हैं जिनकी पृष्ठभूमि वामपंथी और कांग्रेसी रही है। अधिकारी वर्ग का एक खेमा भी यह नहीं चाहता कि प्रदेश में भाजपा अनवरत सत्ता में बनी रहे। यह स्थिति पार्टी स्तर पर सोचनीय चिंताजनक है, क्योंकि ये सलाहकार पार्टी के मूल विचारों के खिलाफ 'किंतु परंतु' लगाकर कामों में रोडा अटकाते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर अटल ,आडवाणी,मोदी और शाह की मेहनत और छवि तथा प्रदेश स्तर पर राजमाता सिंधिया, कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदरलाल पटवा,उमा भारती जैसे कर्मठ और जुझारू नेताओं की बदौलत मध्य प्रदेश में प्राप्त सत्ता का सही रूप में और ईमानदारी से दोहन नहीं हो रहा है। स्वार्थी नेताओं के इस घनचक्कर में जनता पीस रही है और प्रदेश के चाहु मुखी विकास अवरूद्ध हो रहा है और भाजपा कमजोर हो रही है। पार्टी के पुराने एक दर्जन से ज्यादा नेताओं ने मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के मुख्यमंत्रित्व काल के दो साल बीत जाने के बाद भी हृदय से स्वीकार नहीं किया।
कई विधायकों और सांसदों को मंत्री पद नहीं मिलने से अनेकों अवसर पर नाराजगी उजागर होती रहती है। पार्टी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल जी के अथक एवं गंभीर प्रयासों के बावजूद पार्टी में अंदरूनी विवाद और नेताओं की आपसी खींचतान थम नहीं रही है। इसी का परिणाम है कि प्रदेश में सरकारी संस्थाओं, निगमों, मंडलों और स्वास्थ्य सेवाओं में हजारों पद खाली पड़े हैं। इनमें मुख्य रूप से विद्यालयों ,अस्पतालों , नगरीय निकायों, और प्रशासनिक विभागों में अधिकारी-कर्मचारी स्तर के पद शामिल हैं।
कई वैधानिक संस्थाओं में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद जिन पर राजनीतिक नियुक्तियां होती है, लम्बे अरसे से खाली पड़े हैं। रिक्त पदों को भरने के लिए भर्ती प्रक्रिया काफी लचर है। कर्मचारी चयन में कमी के कारण कई संस्थाएं आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे चल रही हैं। फलत: कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। जिसका खामियाजा आम जनता को प्रतिदिन भुगतना पड़ रहा है। नियमित नियुक्तियां नहीं होना सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी की कमजोरी को उजागर करता है।
अब समय आ गया है कि सत्तारुढ पार्टी के नेता अपनी आपसी खींचतान को भूलाकर आम जनता की समस्याओं का समाधान करने के लिए काम करें। वरना ऐसा न हो कि प्रदेश की जागरूक जनता नवंबर-दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव परिणाम को दोहराने पर विचार करने मजबूर हो सकती है।










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