G News 24 : रिलायंस कम्युनिकेशंस के खिलाफ 2,220 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का नया केस !

 राहत का कवच टूटा, CBI का 'हथौड़ा' चला...

रिलायंस कम्युनिकेशंस के खिलाफ 2,220 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का नया केस !

मुंबई अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCom) की मुश्किलें एक बार फिर चरम पर हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट से मिला कानूनी सुरक्षा कवच हटते ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए कंपनी और उसके प्रमोटरों के खिलाफ धोखाधड़ी का दूसरा मुकदमा दर्ज किया है। आज सुबह हुई छापेमारी के बाद कॉरपोरेट जगत में हलचल तेज हो गई है।

मामले के मुख्य बिंदु...

2,220 करोड़ रुपए का गबन: यह नया मामला बैंक ऑफ बड़ौदा की शिकायत पर दर्ज किया गया है। आरोप है कि कंपनी ने बैंक से लिए गए करोड़ों के कर्ज का इस्तेमाल उन उद्देश्यों के लिए नहीं किया जिनके लिए लोन लिया गया था।

फंड्स का डायवर्जन-सीबीआई की FIR के मुताबिक, लोन की रकम को शेल कंपनियों और ग्रुप की ही अन्य सहयोगी संस्थाओं (Related Parties) में ट्रांसफर कर दिया गया, जो सीधे तौर पर बैंकिंग नियमों का उल्लंघन और धोखाधड़ी है।

72 घंटों के भीतर एक्शन- रिलायंस कम्युनिकेशंस के खाते को 'फ्रॉड' घोषित करने पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने रोक लगा रखी थी। 23 फरवरी 2026 को जैसे ही यह रोक (Stay) हटी, सीबीआई ने महज तीन दिनों के भीतर केस दर्ज कर छापेमारी शुरू कर दी।

दूसरा बड़ा मुकदमा- सीबीआई पहले से ही भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की शिकायत पर आरकॉम के खिलाफ एक अन्य धोखाधड़ी के मामले की जांच कर रही है। बैंक ऑफ बड़ौदा का यह केस कंपनी की कानूनी घेराबंदी को और मजबूत करता है।

एक साम्राज्य का ढहना: विश्लेषण

यह कार्रवाई सिर्फ एक डिफॉल्ट का मामला नहीं है, बल्कि भारतीय टेलीकॉम सेक्टर के उस दौर की याद दिलाती है जब आरकॉम एक बड़ी शक्ति हुआ करती थी। 2017 में कंपनी का खाता एनपीए (NPA) होने के बाद से ही कानूनी लड़ाइयां जारी थीं। जांच एजेंसियों का मानना है कि बही-खातों में हेरफेर करके जानबूझकर बैंकों को भारी नुकसान पहुँचाया गया है।

जवाबदेही के बड़े सवाल...

इस पूरी कार्रवाई ने व्यवस्था और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं !

1. देरी की वजह: जो खाता 2017 में ही एनपीए हो चुका था, उस पर ठोस आपराधिक मामला दर्ज होने में 9 साल का वक्त क्यों लगा?

2. बैंकिंग सिस्टम की भूमिका: क्या उन अधिकारियों की भी जांच होगी जिन्होंने बिना पर्याप्त सुरक्षा और गारंटी के जनता की मेहनत की कमाई का इतना बड़ा हिस्सा कंपनी को सौंप दिया?

3. वसूली की उम्मीद: क्या इस छापेमारी और मुकदमेबाजी से बैंकों को उनका पैसा वापस मिल पाएगा, या यह मामला भी सालों तक फाइलों में ही दबा रहेगा?

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