G News 24 : सुनो सरकार : छात्रवृत्ति विलंब से जारी होने पर अनेक परेशानियों का सामना करते हैं विद्यार्थी !

 भरे पेट दी गई दावत और परीक्षा निकल जाने के बाद मिली किताब,दोनों ही अर्थहीन हैं...

सुनो सरकार  : छात्रवृत्ति विलंब से जारी होने पर अनेक परेशानियों का सामना करते हैं विद्यार्थी !

प्री एवं पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाएँ किसी दया या उपकार का नाम नहीं हैं, बल्कि वे उस संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा हैं, जिसके तहत राज्य समाज के कमजोर आय वर्ग को समान अवसर उपलब्ध कराने का वादा करता है। इन योजनाओं का घोषित उद्देश्य स्पष्ट है, आर्थिक रूप से कमजोर अभिभावकों के बच्चों को उच्च शिक्षा के मार्ग में धन की कमी बाधा न बने, वे समय पर पाठ्य सामग्री खरीद सकें, स्कूल-कॉलेज की फीस भर सकें और सम्मानजनक ढंग से अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।

लेकिन जमीनी हकीकत इस उद्देश्य के ठीक उलट खड़ी दिखाई देती है। छात्रवृत्ति समय पर जारी न होकर कई-कई महीनों, बल्कि कभी-कभी पूरे शैक्षणिक सत्र बाद छात्रों के खातों में पहुँचती है। जैसे कि 2024-25 का सत्र कभी का समाप्त हो गया और तमाम छात्र/छात्रों की छात्रवृति अभी तक नहीं मिली है। ऐसे में 2025-26 की छात्रवृति इन्हें कब मिलेगी आप स्वयं सोच सकते हैं। जबकि अप्रेल-मई  में एग्जाम के बाद इनका नया सत्र 2026-27 चालू हो जायेगा। इस सत्र के खर्चे ये विद्यार्थी कैसे वहन करेंगे इसकी भी आप कल्पना करके देखिये। विडंबना यह है कि जब छात्र नई कक्षा में प्रवेश कर चुका होता है, तब उसे पिछली कक्षा की छात्रवृत्ति मिलती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सहायता समय पर नहीं मिली, तो वह सहायता आखिर किस काम की रही?यही कारण है कि अधिकतर विद्यार्थी समय से पहले अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं। खासकर लड़कियों के साथ ये ज्यादा होता है।

कमजोर आय वर्ग के छात्रों के लिए शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं है, वह संघर्ष का दूसरा नाम भी है। फीस जमा करने की समय-सीमा, महंगी पाठ्य सामग्री, प्रैक्टिकल फाइलें, यूनिफॉर्म और परीक्षा शुल्क, इन सबका बोझ छात्र और उसके परिवार पर तुरंत पड़ता है। जब छात्रवृत्ति समय पर नहीं मिलती, तो छात्र या तो कर्ज लेने को मजबूर होता है या फिर अपमान और मानसिक दबाव झेलते हुए पढ़ाई जारी रखने की कोशिश करता है। कई मामलों में फीस समय पर न भर पाने पर स्कूल या कॉलेज प्रशासन द्वारा पेनल्टी लगाई जाती है, डांट-फटकार होती है, जिससे छात्र की मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ता है।

यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि उस नीति की असफलता है जो कागजों में तो कल्याणकारी दिखती है, लेकिन व्यवहार में छात्रों के लिए बोझ बन जाती है। यदि सरकार वास्तव में शिक्षा को सामाजिक उत्थान का माध्यम मानती है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि देर से मिली छात्रवृत्ति, मदद नहीं बल्कि औपचारिकता भर है।

समाधान भी उतना ही स्पष्ट है। छात्रवृत्ति को शैक्षणिक सत्र के शुरुआती कुछ महीनों में, हर हाल में जारी किया जाना चाहिए। आवेदन प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए। स्कूलों और कॉलेजों को निर्देश हों कि छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले छात्रों से फीस के मामले में सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाया जाए और भुगतान में देरी के लिए उन्हें दंडित न किया जाए।

सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा में निवेश तभी सार्थक है जब वह समय पर हो। भूखे पेट दी गई दावत और परीक्षा निकल जाने के बाद मिली किताब—दोनों ही अर्थहीन हैं। यदि छात्रवृत्ति का उद्देश्य वास्तव में कमजोर आय वर्ग के छात्रों को संबल देना है, तो उसे घोषणाओं से निकालकर समयबद्ध और प्रभावी क्रियान्वयन की राह पर लाना होगा। तभी यह योजना कागजों की शोभा नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य की मजबूत नींव बने 

- दिव्या सिंह

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